मर्यादा पुरुषोत्तमराम लोक विश्वास के प्रतीक
श्रीकान्त शरण पाण्डेय
प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, स्वामी विवेकानंद वि0वि0, सिरौंजा, सागर (म0प्र0) पिन 470228
वैदिक युग में तो ‘राम‘ नाम का संकेत मात्र मिलता है, लेकिन पौराणिक युग में राम का चरित्र भारतीय संस्कृति में इतना घुलमिल जाता है , कि दोनो जैसे एक दूसरे के पूरक बन जाते है। राम के उज्जवल चरित्र को लेकर चलने वाली रामकथा की सुगंध भारत को ही नहीं वरन् विदेशो को भी सुवासित करने लगती हैं । ‘‘भारतीय संस्कृति एवं साहित्य में राम का स्थान सर्वोपरि एवं सर्वश्रेष्ठ तो है ही, परन्तु रामकथा की परम्परा एवं विकास कें अवलोकन करने पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि अनेक राष्ट्ों , संस्कृतियों, एवं साहित्य में राम की सत्ता अप्रतिम हैं।1
राम अयोध्या के राजा दशरथ के ज्येष्ठ पुत्र हैं, जिन्हे अनेक विद्वानांे ने ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम‘ की संज्ञा दी हैं। वाल्मीकि रामायण और पुराणादि ग्रन्थों के अनुसार अपने शील और पराक्रम के कारण भारतीय समाज में जैसी लोकपूजा उन्हें मिली वैसी संसार के अन्य किसी धार्मिक और सामाजिक जननेता को शायद ही मिली हो। भारतीय समाज में उन्होंने जीवन का जो आदर्श रखा ,स्नेह और सेवा के जिस पथ का अनुगमन किया उसका महत्व आज भी समूचे भारत में अक्षुण्ण बना हुआ है। वे भारतीय जीवन दर्शन और भारतीय संस्कृति के तथा लोक विश्वास के सच्चे प्रतीक के रुप में उल्लखित है। देखा यह जाता है कि हमारे पूर्चवर्ती विद्वानों ने राम को अलोकिक या आध्यात्मिक दृष्टि से अधिक देखा है। लौकिक या मानवीय दृष्टि से कम ,जबकि तुलसी के राम में हमे अलौकिक तथा लौकिक दोनो शक्तियों का समन्वित रुप मिलता है। इसी संदर्भ में विद्वान प्रेमशंकरजी का मत है कि ‘‘वे नाना विधि करम‘‘ करते है, पुरुष भी हैं- पर शीलवान् ,मर्यादामय-मर्यादा पुरुषेात्तम, विनयपत्रिका में तुलसी जिस आराध्य के प्रंति समर्पित होते है, वह परमेश्वर है, पर अपनी लीलाओं में मनुष्य भी । यदि ऐसा न होता तो भारतीय जन उसकी आस्था में रुचि क्यों लेते।2
तुलसी के राम वाल्यावस्था में एक सामान्य शिशु की तरह लीलाएॅ करते है, परन्तु इन्हीं लीलाओं के बीच कभी कभी अपनी अलौकिकता का भी संकेत कर देते है।
2, ब्रह्याण्ड के नायक राम, माता कौशिल्या को अपने विराटरुप का दर्शन कराते है। ‘‘ एक वार वे राम के दो रुपो को देखकर भ्रम में पड़ जाती हैं, तब राम माता को व्याकुल अवस्था में देखकर मुस्करा देंते हैं-
ईहा वहां दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा।।1
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हंसि दीन्ह मधुर मुसुकानी ।।2
मानव के चरित्र निर्माण में ‘उत्साह‘ बहुत कुछ सहायक होता है। राम के चरित्र में कई ऐसे स्थलों पर भी उत्साह देखा जाता है जिसमें साधारण मानव शीघ्र हतोत्साहित हो जाते हैं। कैकेयी द्वारा चैदह वर्ष का वनवास दिये जाने पर वे किंचित भी विचलित नहीं होते वरन् धैर्यपूर्वक माता की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए कहते है कि आज विधाता मेरे सम्मुख हो गया है-
‘‘भरत प्रान प्रिय पावहि राजु। विधि सव विधि मोहि सनमुख आजू।।
जो न जाऊंवन ऐसेउ काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ समाजा ।।3
तुलसी युगीन समाज में निशाचरी - प्रवृतियां काफी फल -फूलरही थी तथा साधु पुरूषों को उनके द्वारा काफी क्लेश दिया जा रहा था। इसी क्लेश मुक्ति के व्यवस्था स्वरूप तुलसी के राम ने राक्षसांे का वध करने हेतु उत्साहपूर्वक दृढ़ प्रतिज्ञा करते देखे जाते है-
निसिचर हीन करउं महि, भुज उठाइ प्रन कीन्ह।
सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि, जाइ जाइ सुख दीन्ह।।4
राम के पराक्रम और सौन्दर्य से भी अधिक व्यापक प्रभाव उनके शील और आचार व्यवहार पर पड़ा, जिसके कारण उन्हें अपने जीवनकाल में ही नहीः वरन अनुवर्ती युग में ऐसी लोक-प्रियता प्राप्त हुई जैसी विरलै ही किसी व्यक्ति को प्राप्त हुई हो। वे आदर्श पति,स्नेहशील भ्राता, और लोकसेवा नुरक्त,कत्र्तव्यपरायण और मर्यादापुरूषोत्तम राजा थे। जिनके कार्य सम्पूर्ण जन-जन में तटस्थ हुये साथ ही साथ राम के आदर्श और मर्यादा लोक विश्वास के प्रतीक रूप में उभर कर सम्पूर्ण जन-जन के हदय में समाहित हुयें है।
प्रजा को हर तरह से सुखी रखना वे राजा का परम कर्तव्य मानते थे। उनकी धारणा थी कि जिस राजा के शासन में प्रजा दुःखी रहती है, वह नृप अवश्यक ही नरक का अधिकारी होता है , जनकल्याण के भावना से ही उन्होंने राज्य का संचालन किया, जिससे प्रजा धन-धान्य से पूर्ण सुखी, धर्मशील एवं निरामय हो गयी।
गोस्वामी तुलसीदास ने भी मानस में राम राज्य की विशद चर्चा की है। लोकानुरंजन के लिऐ वे अपने सर्वस्व का त्याग करने को तत्पर रहते थे। इसी से भवभूति ने उनके मुॅह से कहलाया है-
स्नेहं दयां च सौरव्यं च यदि वा जानकीमपि।
आराधनाय लोकस्य मुंचतो नास्ति में व्यथा।।
इस तरह राम के चरित्र में भारत के संस्कृति के अनुरूप पारिवारिक और सामाजिक जीवन के उच्चतम आदर्श पाये जाते है। उनमें व्यक्तित्व विकास, लोकहित तथा सुव्यवस्थित, राजस्य संचालन के सभी गुण विद्यमान थे। उन्होने दीनों, आसहायो, संतो, और धमशीलों की रक्षा के लिये जो कार्य किये, आचार-व्यवस्था की जो परम्परा कायम के, सेवा और त्याग का जो उदाहरण प्रस्तुत किया तथा न्याय एवं सत्य की प्रतिष्ठा के लिये व जिस तरह अनवरत प्रयत्नवान रहे, इन सबने उन्हें भारत के जन-जन के मानस मन्दिर में अत्यन्त पवित्र और उच्चासन पर आसीन कर दिया है। जब तक वाल्मीकि रामायण, तुलसी के रामचरितमानस तथा ऐसी ही शत-शत् अन्य रचनाओं में वर्णित राम की कीर्ति- गाथा का चिन्तन- मनन होता रहेगा। तब तक भारतीय संस्कृति और उच्च आदर्शो की यह सुखद परम्परा अक्षुण्ण बनी रहेगी तथा घोर दुर्दिन के समय भी व देशवासियों को शक्ति और प्रेरणा प्रदान करती रहेगी, इसमे सन्देह नहीं।
गोस्वामी तुलसीदास को रामकथा में राम का चरित्र प्रधान है। इसलिए सम्पूर्ण कथा. की परिस्थितियाॅ उन्ही के चरित्र के इर्द-गिर्द घूमती रहती है। वास्तव में तुलसी द्वारा राम के चरित्र के प्रकाशन का मुख्य उदद्ेश्य उनके ब्रहमत्व पक्ष को दिखाने से अधिक मानव पक्ष दिखाना था। ’’ लोक हदय उनकी पुरूषोत्तमता का पूजक है- देवत्व का नहीं। तथा कथित कम जो रियां राम को विशिष्टताओं से मंडित करती है, उन्हें दिव्य साकेत से उतारकर विधि- प्रपंच रंगस्थली, गुणाव गुण- समन्वित जड़ चेतना से संकुचित उस धरती पर ला खड़ी करती है। जिसका भार उतारने के लिए ही ब्रह्रा-राम ने अव्यक्त से व्यक्त असीम से ससीम और नारायण से नर होना स्वीकार किया था।’’
राम जहाॅ से निकलते है वहाॅ की सुषमा बढ जाती है। जंगल में मंगल की छटा छा जाती है। नाना प्रकार की वनस्पतियाॅ फलने-फूलने लगती है। मधुकरों का समूह उन पर मंडराने लगता है और उस पर भी ’’ त्रिविध बयारी’’ बहने लगती है। ये राम के ब्रह्मत्व का ही प्रभाव तो है-
जब ते आई रहे रघुनायक, तव तें भयउ वनु मंगलदायकु।
फूलहिं- फलहिं विटप विधि नाना, मंजु वलित वर वेलि बिताना।।1
सुरतरू सरिस सुभाय सुहाए, मनहुं विवुध बन परिहरि आए।
गुंज मंजुतर मधुकर श्रेणी, त्रिविध बयारि बहइ सुख देनी।।2
राम के चरित्र में मानवीयता का एक जबर्दस्त वेग दिखाई देता है और तुलसी का मानवीय कवि राम को विशुद्ध लौकिक धरातल पर लाकर कभी सीता वियोग में विलाप कराने लगता है, कभी लक्ष्मण शक्ति के समय एकाकीपन महसूस कराके विकट दुःख की स्थिति का सामना कराता है, कभी लगातार तीन दिन तक पयोधि की वंदना कराता है और कभी गुह निषाद और केवट जैसे अछूतों के गले मिलवाता है। 1’ गोस्वामी तुलसी के राम थे सब मानवीय कार्य करते हुए मानव जीवन का सभी में श्रेष्ठ घोषित करते है-
’’बडे़ भाग मानुष तन पावा, सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा। 2
राम मनुष्य रूप को ही सर्वोपरी मानते है। उत्तरकाण्ड में तुलसी राम को मानवीयता को आध्यात्मिकता का जामा पहिनाकर राम के मुंह से ही मानव जीवन को सर्वोत्कृष्ट घोषित कराते है-
’’जो न तरे भव सागर, नर समाज अस पाई।
सौ कृत निदंक मंदमति, आत्माहन गति जाई।3
तुलसी परिवार से लेकर राष्ट्र के विभिन्न मानव वर्गाे में नैतिकता का समावेश करना चाहते थे। राजनैतिक विघटन और कवि के प्रभाव से समाज का वातावरण दूषित तथा नैतिक स्तर पंतित हो चुका था। हिन्दी के वैष्णव भक्त कवियों ने सामाजिक अनाचार एवं नैतिक भ्रष्टाचार का वर्णन किया है। वे प्रायः इसमें समूल उच्छेद के और सतत् प्रयत्नशील मिलते है। तुलसी का कलि-निरूपण इस प्रसंग में विशेष दृष्टव्य है। तुलसी के राम मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में विकसित किये गये हैं। जिनके नियम संयम और जिनका विश्वास सर्वफल प्रदान करने वाला था। वह तटस्थ विश्वासी थे इसलिए तुलसी के राम मर्यादा पुरूषोत्तम सम्पूर्ण विश्व के लोक विश्वास के प्रतीक रूप मंे माने गये।
संदर्भः-
1. भ.ह. राजूरकर: रामकथा के पात्र क्रं0 130
2. प्रेमशंकर: राम काव्य और तुलसी क्रं0 107
3. तुलसी: मानस -1- 201
4. उत्तर रामचरित: 1-12
5. भगवती प्रसाद सिंह: राम काव्य धारा- अनुसंधान एवं अनुचिंतन क्रं0 196
6. तुलसी मानस-2/137/3-4
7. भगवत शरण द्विवेदी: तुलसी साहित्य का सांस्कृतिक अनुशीलन क्रं0 172
8. तुलसी: मानस -7-43-4
Received on 15.03.2015 Modified on 28.03.2015
Accepted on 30.03.2015 © A&V Publication all right reserved
Int. J. Rev. & Res. Social Sci. 3(1): Jan. – Mar. 2015; Page 37-39